सुंदरता को निखारता है कश्मीरी पहनावा

Kashmiri.jpg

Neighbourhood News Desk/ Kanika Chauhan: अपनी नैसर्गिक और अगाध खूबसूरती के लिए कश्मीर की वादियों का कवियों और गायकों ने भरपूर चित्रण किया है जिन्होंने इसे विभिन्न रस्मों, संस्कृतियों और जीने के तरीके का एक खुशनुमा स्थान बताया है। यहां की जमीन और लोगों की आत्मसात करने वाली प्रवृत्तियों ने जीवन का एक अनूठा दर्शन पैदा किया है जिसमें हर धर्म के बुनियादों को न केवल उचित जगह मिली है बल्कि पर्याप्त महत्व भी मिला है। कश्मीर को न केवल “धरती पर स्वर्ग” के रूप में जाना जाता है बल्कि अलग-अलग मजहबों और मूल्यों का पालन करने के बावजूद दुनिया भर में मानव मूल्यों के एक स्वर्ग के रूप में भी यह अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है। कश्मीर के मूल तत्व की पहचान इसकी समृद्ध संस्कृति और गर्मजोशी से भरे लोगों से होती है। यह अपने शानदार आभूषणों और पोशाकों के लिए भी विख्यात है। घाटी में आभूषण न केवल उनके आतंरिक मूल्य और खूबसूरती के लिए पहने जाते हैं बल्कि उनके धार्मिक कारण भी होते हैं। इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण कश्मीरी पंडितों की विवाहिता महिलाओं द्वारा पहना जाने वाला खूबसूरत सोने का आभूषण देज-होर है।

गहने हमेशा से मनुष्य को आकर्षित करते रहे हैं। आदि काल से जब उसने खाना पहनना, घर बनाना सीखा तब ही गहने भी बनाए पत्थर के और ख़ुद को उनसे सजाया। वक्त के साथ-साथ गहनों का सफर भी चलता रहा और यह अपने नए प्रकार के घातु में ढल कर स्त्री पुरूष दोनों के व्यक्तित्व की शोभा बढ़ाते रहे है। इनको पहनना सिर्फ़ शिंगार की दृष्टि से ही नहीं था बलिक शरीर के उन महत्वपूर्ण जगह पर दबाब देने से भी था जो मनुष्य को स्वस्थ रखते हैं। यह बात विज्ञान ने भी सिद्ध की है।इसी सिलसले में आज आपसे कश्मीरी गहनों के बारे में बात करते हैं। हर प्रांत हर जगह की अपनी एक ख़ास पहचान होती है और कोई न कोई बात उसके पहनावे ,गहनों और रीति रिवाजों से जुड़ी होती है। उनके बारे में जानना बहुत ही दिलचस्प लगता है। कानों से लटकती लाल डोरी गुलाबी चेहरों का नूर और उस पर डाला हुआ फेरन जैसे एक जादू सा करता है…………..

कश्मीर में आभूषण सोने के होते हैं लेकिन कभी-कभी खूबसूरती बढ़ाने के लिए उनकी बनावट और डिजाइन में दूधिये पत्थर, रक्तमणि, नीलमणि, फिरोजा और सुलेमानी पत्थर भी जड़ दिए जाते हैं। हालांकि इनमें से अधिकांश रत्न क्षेत्र के बाहर से लाए जाते हैं लेकिन पन्ना, नीलमणि, सुलेमानी पत्थर और बिल्लौरी स्वदेशी हैं और जम्मू-कश्मीर राज्य के भीतर ही पाए जाते हैं।

386491_322443857784975_204230911_n.jpg

अपने फन में है माहिर

कश्मीरी संगतराश अपने फन में बहुत माहिर होते हैं और उनकी कारीगरी की जटिलता और महीनी के लिए उन्हें प्रशंसित किया जाना चाहिए। कश्मीर की मनमोहक खूबसूरती इसकी सभी कलाओं और शिल्पों में अभिव्यक्त होती है। गहनों के डिजाइन विशिष्ट होते हैं और दुनिया के किसी भी हिस्से में इनकी आसानी से पहचान की जा सकती है। प्रकृति इसके लघु चित्र कला रूप की डिजाइन में दिखती है। बादाम, चिनार के पत्ते और मैना और बुलबुल जैसे पक्षी महत्वपूर्ण हैं।
कश्मीर में सुनार अपने काम को बेहद पसंद करता है और एक खूबसूरत चीज बनाने के लिए देर रात तक काम करता है। दिलचस्प बात यह है कि पंडितों और मुस्लिम महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले ज्यादातर गहनों के रूप और आकार में काफी समानता होती है। कश्मीरी महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले कुछ प्रमुख आभूषण के बारे में जानने के लिए आगे पढ़े….
जिगनी और टीका – ललाट पर पहने जाते हैं और आमतौर पर ये आकार में त्रिकोणीय, अर्द्ध-वक्राकार और वक्राकार होते हैं। ये सोने और चांदी से बने होते हैं और इनकी किनारी पर मोती और सोने की पत्तियां लटकती रहती हैं।

अपरिहार्य गहना है देज-होर

देज-होर विवाहिता कश्मीरी पंडित महिलाओं के लिए एक अपरिहार्य गहना है जो इसे शादी अर्थात ‘सुहाग’ की एक निशानी के रूप में हमेशा पहने रहती हैं। अट्टा-होर विवाहिता कश्मीरी पंडित महिलाओं के सर के दोनों तरफ कान में लटका रहता है और सर के ऊपर से जाने वाले सोने की चेन के साथ जुड़ा रहता है। कन-दूर कान में पहने जाने वाला एक अन्य गहना है जिसे ज्यादातर लड़कियां पहनती हैं। ये गहने सोने और चांदी के बने होते हैं इनमें लाल और हरे रत्न या मोती जड़े होते हैं।

गुणस

मटमैले रंग के एक जहरीले पहाडी सांप को गुणस कहते हैं और जो सर्प मुखी सोने का कंगन बनाया जाता है उसको भी गुणस कहते हैं। इस आभूषण को जब मंत्रित कर के लड़की की दोनों कलाईयों में पहनाया जाता है तो मान लिया जाता है की इस की शक्ति उसकी रगों में उतर जाएगी और वह अपनी रक्षा कर सकेगी।

कन वाजि

कर्ण फूल वाजि गोल कुंडल को कहते हैं और कान का कुंडल यह फूल के आकार में बना सोने का आभूषण है जिसको पहनाने से यह माना जाता है की दोनों कानो में पहनाने से इडा और पिंगला दोनों नाडीयों को जगा देंगे इडा नाडी खुलने से चन्द्र शक्ति और दायें तरफ़ पहनाने से पिंगला नाडी खुलेगी जिस से सूरज शक्ति जग जायेगी।

ड्याजी

होर काया विज्ञान की बुनियाद पर सोने का एक आभूषण पहनाया जाता है जो योनी मुद्रा आकार का होता है यह प्रतीक हैं दो शक्तियों ने अब एक होना है। ड्याजी शब्द मूल द्विज से आया है जिसका अर्थ है दो और होर का मतलब जुड़ना। इस में तीन पतियाँ बनायी जाती है जो तीन बुनयादी गुण है .इच्छा ,ज्ञान ,और क्रिया। यह सोने का तिल्ले के तीन फूलों के रूप में होती है।

तल राज तल रज

इस आभूषण के दोनों सिरों पर जो लाल डोरियाँ बाँधी जाती है ,उनको तल रज कहते हैं। रज का अर्थ है –धागा और ताल से मतलब है सिर के तालू की वह जगह ,जहाँ पूरी काया में बसे हुए चक्रों का आखरी चक्र होता है सहस्त्रार। आर का अर्थ है धुरी और वह धुरी जिसके इर्द गिर्द कई चक्र बनते हैं। काया विज्ञान को जानने वाले रोगियों के अनुसार इस सहस्त्रार में कुंडलिनी जागृत होती है ,परम चेतना जागृत होती है। यह आभूषण दोनों कानों के मध्य में पहना जाता है .उस नाडी को छेद कर के जिसका संबंध सिर के तालू के साथ जुडा होता है ,और माना जाता है की इस आभूषण के पहनने से सहस्त्रार के साथ जुड़ी हुई नाडियाँ तरंगित हो जायेंगी।

कल वल्युन कलपोश

कल खोपडी को कहते हैं और पोश पहनने को। यह सिर पर ढकने वाली एक टोपी सी होती है -जो सुनहरी रंग के कपड़े को आठ टुकडों में काट कर बनायी जाती है। यह उन का सुनहरी रंग का कपड़ा सा होता है और जिस पर यदि तिल्ले की कढाई की जाए तो उसको जरबाफ कहते हैं। यह आठ टुकड़े आठ सिद्धियों के प्रतीक हैं इस एक लाल रंग की पट्टी राजस गुन की प्रतीक है और सफ़ेद रंग के जो फेर दिए जाते हैं वह सात्विक रूचि को दर्शाते हैं। इस आठ डोरियों को दोनों और से एक एक सुई के साथ जोड़ दिया जाता है जिस पर काले रंग का बटन लगा होता है। यह बटन तामसिक शक्तियों से रक्षा करेगा इस बात को बताता है।

वोजिज डूर-लाल डोरी

वोजिज लफ्ज़ उज्जवल लफ्ज़ से आया है और डूर का अर्थ है डोरी। इसको दोनों कानो में ड्याजी – होर जो आभूषण है वह दोनी कानो में इसके साथ बाँधा जाता है। उनका लाल रंग शक्ति का प्रतीक है और बाएँ कान में स्त्री अपने लिए पहनती है और दायें कान में अपने पति के लिए पहनती है इसका अर्थ यह है की दोनों ने आपने अपने तीन गुन इच्छा ज्ञान और क्रिया अब एक कर लिए हैं।
तरंग कालपोश को सफ़ेद सूती कपड़े में लपेटा जाता है -जो सिर से ले कर पीठ की और से होता हुआ कमर तक लटका होता है। मूलाधार चक्र तक और इस तरह सब छः चक्र उस कपड़े की लपेट में आ जाते हैं इसका सफ़ेद रंग तन मन और आत्मा की पाकीजगी का चिन्ह है।

फेरन

यह सर्दियों में पश्मीने का होता है और गर्मियों में सूती कपड़े का। यह भी काले रंग का कभी नही होता है। इसकी कटाई योनी मुद्रा में की जाती है जिस पर लाल रंग की पट्टी जरुर लगाई जाती है। इसको दोनों तरफ़ से चाक नही किया जाता इसका अर्थ यह होता है की शक्ति बिखरेगी नही।इसके बायीं तरफ़ जेब होती है जो स्त्री की अपनी तरफ़ है। उस तरफ़ की जेब लक्ष्मी का प्रतीक है और इस में भी लाल पट्टी जरुर लगाई जाती है। इसका अर्थ यह है की लक्ष्मी स्त्री के पास रहेगी और वह इसकी रक्षा अपने तमस गुण से करेगी।

पौंछ

यह फेरन के अन्दर पहने जाने वाला कपड़ा होता है और यह अक्सर सफ़ेद रंग का ही होता है -यानी सात्विक शक्ति स्त्री के शरीर के साथ रहेगी जिस के ऊपर लाल रंग का फेरन होगा रजस शक्ति का प्रतीक। इसकी बाहों की लम्बाई कभी भी अधिक लम्बी कलाई तक नही होती है और इस के आख़िर में में भी लाल पट्टी लगा दी जाती है।

लुंगी

यह कई रंगों का एक पटका सा होता है जिसको फेरन के साथ कमर पर बाँध लिया जाता है और इसकी गाँठ को एक ख़ास तरकीब से बाँधा जाता है जो पटके की पहले लगी दो गांठो को लपेट लेती है जो की एक स्त्री शक्ति का प्रतीक है और एक पुरूष शक्ति का प्रतीक है और एक गाँठ में बाँधने का मतलब है की अब वह दोनों एक हैं।

पुलहोर

कुशा ग्रास को सुनहरी धागों में बुन कर स्त्री के पैरों के लिए जो जूती बनायी जाती है उसको पुलहोर कहते हैं। माना जाता है कि कुशा ग्रास की शक्ति के सामने असुरी शक्ति शक्तिहीन हो जाती हैं और ज़िन्दगी की मुश्किल राहों पर स्त्री आसानी से आगे बढ़ सकेंगी और साबुत कदम रख सकेगी।
इस प्रकार यह गहने शक्ति के भी प्रतीक बन जाते हैं और हर लड़की खुशी खुशी इनको धारण करती है। यह कोई बंधन नहीं एक परम्परा है जिस का सम्मान और उस से प्यार हर लड़की को ख़ुद बा ख़ुद हो जाता है।

कश्मीर की पारंपरिक पोशाक

कश्मीर की पारंपरिक पोशाक अपनी कशीदाकारी और पेचदार डिजाइनों के लिए जानी जाती है जो राज्य की संस्कृति और प्राकृतिक दृश्यों की समृद्धि को परिलक्षित करती है। कश्मीर के पोशाकों की समानता अरब, ईरान और तुर्किस्तान में देखी जाती है। ऐसा विश्वास है कि सुलतान सिकंदर के शासनकाल में सैय्यद अली हमदानी ने इसे प्रचलित किया। कश्मीर घाटी के कश्मीरी पंडितों ने भी इसे अपना लिया। इसमें शरीर का निचला हिस्सा फारसी मूल के ‘सलवार’ नामक चौड़े पैजामे से ढका रहता था जबकि ऊपरी हिस्से में पूरे बांह की कमीज पहनी जाती थी। इसके ऊपर एक छोटा अंगरखा कोट होता था जिसे सदरी कहते थे। बाहरी लबादे को चोगा कहते थे जो नीचे टखनों तक आता था इसकी एक लंबी, ढीली आस्तीन होती थी और एक कमरबंद होता था। सर की पोशाक एक छोटे कपड़े से ढका छोटी चुस्त टोपी से बनी होती थी। इसी से पगड़ी बनती थी। त्यौहार के मौके पर सिल्क पहना जाता था। धनी और समाज के समृद्ध वर्गों के बीच पोशाक का ऐसा ही प्रचलन व्याप्त था।
गरीब वर्गों के लिए पोशाक में मध्य युग के बाद से कोई परिवर्तन नहीं आया है। पुरुष अपने मुंडे हुए सरों पर एक खोपड़ी नुमा टोपी पहनते थे पर पगड़ी नहीं बांधते थे। वे अपने शरीर को फेरन नामक एक लंबे ढीले ऊनी वस्त्र से ढकते थे जो गर्दन से लेकर कमर तक खुला होता था, कमर के पास वे एक पेटी बांधते थे और यह टखनों तक जाता था। जूते पूलहरु नामक घास से बने होते थे। कुछ लोग खड़ांउ नामक लकड़ी के चप्पल पहनते थे। महिलाओं की पोशाके भी पुरुषों जैसे होती थी फर्क इतना ही था कि उनके सिरों पर बांधने का एक फीता होता था और उसके ऊपर एक दुपट्टा होता था जो सिर से कंधों तक फैला होता था। कश्मीरी महिलाओं के सिर की पोशाक को कासबा बोलते थे। कश्मीरी पंडित महिलाएं भी कासबा का उपयोग करती थी लेकिन वे इसे तरंगा बोलती थीं जो स्त्रियों के पहनने की टोपी होती थी और यह पीछे से एड़ी तक फैली होती थी।

आज के जमाने की पोशाके

वर्तमान में कश्मीर में पोशाकों में बहुत परिवर्तन आया है। अन्य कई संस्कृतियों और समाजों की तरह कश्मीर ने भी जीने की आधुनिक पश्चिमी शैली अपना ली है। इस घुसपैठ के बावजूद समाज के सभी वर्गों द्वारा खासकर जाड़ों और राज्य के विषम मौसम में ठंड से मुक्ति पाने के लिए फेरन अवश्य पहना जाता है। एक कश्मीरी आमतौर पर जाड़ों के दौरान एक मौटे ऊनी कपड़े से बने फेरन तथा गर्मियों के दौरान सूती कपड़ों से बने फेरन को पहनकर प्रसन्न और गौरवान्वित महसूस करता है। अब यह पोशाक दूसरे राज्यों में भी लोकप्रिय हो गया है। फेरन को यहां आने वाले यात्रियों के बीच बेशुमार लोकप्रियता मिल रही है जिसे हमारे फिल्म उद्योग की हाल की कई बॉलीवुड फिल्मों में जगह मिली है।
एक कश्मीरी अपनी जमीन की अनूठी विरासत और पहचान से जुड़कर बहुत गर्व का अनुभव करता है। कश्मीर से बाहर देश के अन्य क्षेत्रों में रहने वाले कश्मीरी पंडितों की बहुसंख्यक आबादी अभी भी अपनी पारंपरिक पोशाक का उपयोग करना नहीं भूली है। उनमें से अधिकांश अभी भी खूबसूरत कश्मीरी आभूषण पहनते हैं। यहां यह अवश्य याद रखा जाना चाहिए कि सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक मूल्य शायद ही कभी मरते हैं। यह बात सभी पर लागू होती है।

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s